ये लड़ाई है दिए की और तूफ़ान की

0
75

theteचैतन्य भट्ट
भोपाल = एक तरफ है समूची सत्ता की ताकत और उसके साथ चाटुकार बड़े अफसरों की फ़ौज तो दूसरी तरफ है एक अकेला अफसर…… जो बरसों से अपने अधिकारों और अस्मिता की रक्षा के लिए इन दोनों ही ताकतों से लड़ रहा है| ये कहानी है मध्यप्रदेश के आईऐएस अफसर रमेश थेटे की जो पिछले कई सालो से मध्यप्रदेश शासन और उसके अफसरों से जंग करते करते अपनी जिंदगी के कई बरस बेकार कर चुके है पर उनका संघर्ष अभी भी थमा नहीं है उनकी लड़ाई जारी है| सत्ता के सिंहासन में बैठे नेता अपने चहेते और चापलूस अफसरों के पक्ष में भले ही खड़े दिखाई दे और थेटे को लगातार प्रताड़ित करते रहें पर थेटे हार मानने वालो में से नहीं है ये बात उनके अभी तक के संघर्षों से तो सिद्ध हो ही जाते है |
कई बरस पहले एक लाख की रिश्वत के आरोप में रमेश थेटे को प्रदेश की लोकायुक्त पुलिस ने पकड़ा मामला चला थेटे निर्दोष पाए गया इस बीच सरकार ने पहले उन्हें निलंबित किया फिर नौकरी से बर्खास्त कर दिया जबकि लोकायुक्त जांच में फंसे अनेक नौकशाह आज भी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के गले के हार बने हुए तमाम महत्वपूर्ण विभागों के सर्वेसर्वा बने हुए है पर रमेश थेटे के खिलाफ इतनी सरपट कार्यवाह हुई जो प्रदेश के इतिहास में एक उदाहरण बन गया है| अपनी बर्खस्तगी के खिलाफ थेटे ने सर्वोच्च न्यायलय तक लड़ाई लड़ी और न्यायायलय ने उनकी बर्खास्तगी को गलत ठहराते हुए उन्हें पुनः सेवा में लेने के आदेश दिए पर अपनी हार से बैखलाई मध्यप्रदेश सरकार और सरकार के चहेते अफसरोंने भी रमेश थेटे को वो जगह नहीं दी जिसके वे हकदार थे उनके बेच के अधिकारी प्रमुख सचिव बन गएपर थेटे को पदोन्नति नही मिली अपने ऊपर हो रहे अत्याचार और बदले की भावना से की जा रही कार्यवाही के खिलाफ थेटे ने आवाज उठाई और इसे दलित अत्याचार के रूप में परिभषित करते हुए दलित अफसरों और नेताओ की मदद से अपनी यह जंग जीत ली शासन को उन्हें सचिव पद पर पदोन्नति देनी ही पड़ी
यद्यपी थेटे को सरकार ने पदोन्नति तो दे दी पर उन्हें बाल भवन में एक बेकार से पद पर बैठा कर उन्हें लूप लाइन में लगा दिया इधर अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे थेटे के समर्थन में जब प्रदेश का दलित समाज सामने आने लगा तब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को अपनी चुनावी गणित में दरार दिखाई देने लगी और झखमार कर मेश थेटे को पंचायत और ग्रामीण विकास मंत्रालय में सचिव पद पर पदस्थ कर दिया पर थेटे को शायद ये मालूम नहीं था कि यंहा उनका सबका एक ऐसे अफसर से पड़ने वाला था जो कांग्रेस के शासन काल में दिग्विजय सिंह का खास था और शिवराज सिंह के शासन काल में मुख्यमंत्री का खास बन गया |राधेश्याम जुलानिया नामक इस अफसर से थेटे के पटरी नहीं बैठी अपर मुख्या सचिव राधेश्याम जुलानिया ने रमेश थेटे के सचिव पद के तमाम अधिकार छीन कर उन्हें एक तरह से पंगू बना दिया| जाहिर था लड़ाकू प्रवति वाले रमेश थेटे को या सहन नहीं हुआ और अपने इस अफसर के खिलाफ वे एफआईआर लिखवाने पुलिस स्टेशन पंहुच गए जो हाल ही में आएऐएस अफसर असोसिएशन के अध्यक्ष बन गए थे जुलानिया के खिलाफ रमेश थेटे का आरोप था की उन्हें राधेश्याम जुलानिया ने जातिगत रूप से अपमानित किया और अपने इस आरोप के सबूत बतौर रमेश थेटे ने एक सीडी भी पुलिस को सौपी इस बात की शिकायत वे पहले पूर्व मुख्या सचिव अंटोनी डिसा और वर्तमान मुख्या सचिव बीपी सिंह से भी कर चुके थे उतना ही नहीं उन्होंने इस बार की शिकायत मुख्यमंत्री से भी की थी पर उनकी सुनवाई नहीं हुई
सवाल ये है की एक दलित अफसर को तरह तरह से प्रताड़ित कर सरकार को क्या हासिल हो रहा है क्यों प्रदेश की ऊंची जाति केअफसर दलित रमेश थेटे के मामले में चुप्पी साधे हुए है जिस आईएएस अफसर असोसिएशन से रमेश थेटे को न्याय की आशा थी उसके सर्वेसर्वा जब खुद राधेश्याम जुलानिया ही बन बैठे हो तो वंहा से उन्हें न्याय की उम्मीद ही बेकार है हां इतना जरूर हुआ की सरकार ने रमेश थेटे को सचिव पद से हटाकर उन्हें मंत्रालय में ओएसडी के पद पर पदस्थ कर दिया यानि हमेशा की तरह इस बार फिर सरकार और प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने एक दलित के साथ अन्याय कर दिया| पर कहते है न तूफ़ान का अँधेरा कितना भी बड़ा और गहरा क्यो न हो एक छोटा सा दिया भी उस तूफ़ान और अँधेरे का का मुकाबला कर लेता है रमेश थेटे का संघर्ष अभी ख़त्म नहीं हुआ है वे एक गरीब घर से थे आईएस बनाने के लिए उन्होंने बिजली के खंभो के नीचे की रोशनी का सहारा लिया था शायद यही जिजीविषा उन्हें सरकार और उसके प्रभावशाली अफसरों से लड़ने की ताकत देती है